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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
ग्रहणं धर्मराजस्य भारद्वाजोऽनुगृध्यति |  १४   क
शक्तश्चापि रणे द्रोणो निगृहीतुं युधिष्ठिरम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति