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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मम जय़ो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति |  १९   क
यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीय़ाद्युधिष्ठिरम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति