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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे |  ३३   क
कृतज्ञतां दय़ां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय़ ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति