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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनञ्जय़म् |  ८   क
हते जय़द्रथे राजन्पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति