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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
इति तस्य व्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः |  १७   क
श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्छितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति