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आदि पर्व
अध्याय ८७
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यय़ातिरु उवाच
अप्राप्य दीर्घमाय़ुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत् |  ३   क
तप्येत यदि तत्कृत्वा चरेत्सोऽन्यत्ततस्तपः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति