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आदि पर्व
अध्याय ८७
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अष्टक उवाच
केनासि दूतः प्रहितोऽद्य राज; न्युवा स्रग्वी दर्शनीय़ः सुवर्चाः |  ५   क
कुत आगतः कतरस्यां दिशि त्व; मुताहो स्वित्पार्थिवं स्थानमस्ति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति