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अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
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शुक्र उवाच
वन्या ग्राम्याश्चेह तथा कृष्टोप्ताः पर्वताश्रय़ाः |  २५   क
अकण्टकाः कण्टकिन्यो गन्धरूपरसान्विताः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति