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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
स भूय़ः शुशुभे पार्थस्ताडितो गदय़ा रणे |  ५९   क
उद्भिन्नरुधिरो राजन्प्रभिन्न इव कुञ्जरः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति