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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
ततो ह्ययत्नतः क्षिप्रं तव पुत्रो जनाधिप |  ३०   क
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद्भृशम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति