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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्नस्य वहवो राजन्नुत्सर्गाः पर्वतोपमाः |  १२   क
दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदाञ्जनाः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति