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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा |  १९   क
द्रौपद्याः प्रिय़कामेन केवलं वाहुसंश्रय़ात् |  १९   ख
गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति