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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
अनादिष्टस्तु गुरुणा को नु युध्येत मानवः |  १४   क
आदिष्टस्तु त्वय़ा राजन्को न युध्येत मादृशः |  १४   ख
अभिजानामि तं देशं यत्र यास्याम्यहं प्रभो ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति