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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
यदेतत्कुञ्जरानीकं साहस्रमनुपश्यसि |  १६   क
कुलमञ्जनकं नाम यत्रैते वीर्यशालिनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति