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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
शूराश्च कृतविद्याश्च स्पर्धन्ते च परस्परम् |  २२   क
नित्यं च समरे राजन्विजिगीषन्ति मानवान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति