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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
सततं प्रिय़कामाश्च कर्णस्यैते वशे स्थिताः |  २४   क
तस्यैव वचनाद्राजन्निवृत्ताः श्वेतवाहनात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति