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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
किरातराजो यान्प्रादाद्गृहीतः सव्यसाचिना |  २८   क
स्वलङ्कृतांस्तथा प्रेष्यानिच्छञ्जीवितमात्मनः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति