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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिताः |  ४५   क
तांस्त्वहं प्रमथिष्यामि तृणानीव हुताशनः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति