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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
अस्मिंस्तु खलु सङ्ग्रामे ग्राह्यं विविधमाय़ुधम् |  ४७   क
यथोपदिष्टमाचार्यैः कार्यः पञ्चगुणो रथः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति