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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
न हि मे पाण्डवात्कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते |  ५   क
यो वै प्रिय़तरो राजन्सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति