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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तान्सर्वतो मुक्त्वा सदश्वांश्चतुरो जनाः |  ५४   क
रसवत्पाय़यामासुः पानं मदसमीरिणम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति