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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रिय़ः सखा |  ५९   क
न्यवेदय़द्रथं युक्तं वासवस्येव मातलिः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति