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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते वाजिनो हृष्टाः सुपुष्टा वातरंहसः |  ६५   क
अजय़्या जैत्रमूहुस्तं विकुर्वन्तः स्म सैन्धवाः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति