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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं वलम् |  ६७   क
आय़त्यां च तदात्वे च श्रेय़ो राज्ञोऽभिरक्षणम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति