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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने |  २८   क
तान्निहत्य रणे शूरः पुनर्यास्यति मानुषान् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति