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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़े हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ |  ८   क
तय़ोः प्रिय़े स्थितं चैव विद्धि मां राजपुङ्गव ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति