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शान्ति पर्व
अध्याय ८८
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युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन्राष्ट्रस्यैव च सङ्ग्रहम् |  १   क
सम्यग्जिज्ञासमानाय़ प्रव्रूहि भरतर्षभ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति