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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
अहमेव हि संमोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् |  २४   क
मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानिह ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति