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शान्ति पर्व
अध्याय ८८
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भीष्म उवाच
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां वापि तृष्णय़ा |  १६   क
ईहाद्वाराणि संरुध्य राजा सम्प्रीतिदर्शनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति