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शान्ति पर्व
अध्याय ८८
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भीष्म उवाच
प्रद्विषन्ति परिख्यातं राजानमतिखादिनम् |  १७   क
प्रद्विष्टस्य कुतः श्रेय़ः सम्प्रिय़ो लभते प्रिय़म् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति