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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं निर्जितं दृष्ट्वा तावका भरतर्षभ |  ५२   क
धनञ्जय़शरैर्नुन्नाः प्राद्रवन्त दिशो दश ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति