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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
कीचकोऽय़ं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम |  ६४   क
परस्त्रीकामसंमत्तः समागच्छत पश्यत ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति