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वन पर्व
अध्याय ८८
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धौम्य उवाच
यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात्तमृषिसत्तमम् |  १४   क
स्वं स्वं तोय़मुपादाय़ परिवार्योपतस्थिरे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति