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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कृष्ण महावुद्धेर्गम्भीरस्य महात्मनः |  ५३   क
क्षत्तुः शीलमलङ्कारो लोकान्विष्टभ्य तिष्ठति ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति