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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
निर्वासनं च नगरात्प्रव्रज्या च परन्तप |  ५७   क
नानाविधानां दुःखानामावासोऽस्मि जनार्दन |  ५७   ख
अज्ञातचर्या वालानामवरोधश्च केशव ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति