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भीष्म पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य पापस्य सततं क्रिय़माणस्य कर्मणः |  २०   क
सम्प्राप्तं सुमहद्घोरं फलं किम्पाकसंनिभम् |  २०   ख
स तद्भुङ्क्ष्व महाराज सपुत्रः ससुहृज्जनः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति