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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं तत्र गच्छामः प्रष्टुं कुरुपितामहम् |  ५२   क
प्रणम्य शिरसा चैनं मन्त्रं पृच्छाम माधव |  ५२   ख
स नो दास्यति यं मन्त्रं तेन योत्स्यामहे परान् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति