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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
याहं गाण्डीवधन्वानं सर्वशस्त्रभृतां वरम् |  ६९   क
धनञ्जय़ं न पश्यामि का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति