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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
पराश्रय़ा वासुदेव या जीवामि धिगस्तु माम् |  ७३   क
वृत्तेः कृपणलव्धाय़ा अप्रतिष्ठैव ज्याय़सी ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति