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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
अथो धनञ्जय़ं व्रूय़ा नित्योद्युक्तं वृकोदरम् |  ७४   क
यदर्थं क्षत्रिय़ा सूते तस्य कालोऽय़मागतः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति