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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्तग्राम्यसुखाः पार्था नित्यं वीरसुखप्रिय़ाः |  ९४   क
न ते स्वल्पेन तुष्येय़ुर्महोत्साहा महावलाः ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति