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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रिय़ाः |  ९५   क
उत्तमांश्च परिक्लेशान्भोगांश्चातीव मानुषान् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति