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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
यथाय़ं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् |  ११६   क
तथा विधत्स्व कल्याणि त्वां वय़ं शरणं गताः ||  ११६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति