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भीष्म पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तस्य भीष्मस्य रक्षसः |  १६   क
आचार्यमुपसङ्गम्य भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति