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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राकारस्थाश्च ये केचिन्निशाचरगणास्तदा |  ३१   क
प्रदुद्रुवुस्ते शतशः कपिभिः समभिद्रुताः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति