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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
विशीर्णे कार्मुके राजन्प्रक्षीणेषु च वाजिषु |  ३   क
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति