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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रविश्य भवनं प्रसुप्तो मधुसूदनः |  १   क
याममात्रावशेषाय़ां यामिन्यां प्रत्यवुध्यत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति