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भीष्म पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
वाह्लिकं च त्रिभिर्वाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे |  ३१   क
कृपमेकेन विव्याध चित्रसेनं त्रिभिः शरैः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति