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भीष्म पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
पूर्णाय़तविसृष्टेन सम्यक्प्रणिहितेन च |  ३२   क
जत्रुदेशे समासाद्य विकर्णं समताडय़त् |  ३२   ख
न्यषीदत्स रथोपस्थे शोणितेन परिप्लुतः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति