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भीष्म पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
विविंशतेश्च द्रौणेश्च यन्तारौ समताडय़त् |  ३४   क
तौ पेततू रथोपस्थे रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति