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भीष्म पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
स तैर्विद्धः स्रवन्रक्तं प्रभिन्न इव कुञ्जरः |  ४   क
दध्रे मतिं विनाशाय़ राज्ञः स पिशिताशनः |  ४   ख
जग्राह च महाशक्तिं गिरीणामपि दारणीम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति