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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
गजैश्च वहुधा छिन्नैः शय़ानैः पर्वतोपमैः |  १३   क
रराजातिभृशं भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति